दलमा पत्थर नहीं, हमारी पहचान है”: माकुलाकोचा में बंदरगाह परियोजना के खिलाफ गूंजी हजारों की आवाज

जमशेदपुर:”दलमा पत्थर नहीं — हमारी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व है।” इसी संकल्प के साथ आज दलमा की तराई में स्थित माकुलाकोचा फुटबॉल मैदान (हिरण पार्क के पास) में एक ऐतिहासिक महा जन सम्मेलन का आयोजन किया गया। दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंच (कोल्हान प्रमंडल) के तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन में हजारों की संख्या में ग्रामीणों, महिलाओं और युवाओं ने अपनी जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए हुंकार भरी।

प्रस्तावित बंदरगाह और कॉरपोरेट दखल का विरोध

यह सम्मेलन मुख्य रूप से प्रस्तावित बंदरगाह परियोजना और उन योजनाओं के विरोध में बुलाया गया था, जिनसे दलमा के पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय समुदायों के संवैधानिक अधिकारों को खतरा है।वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि विकास के नाम पर अरबों की योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन स्थानीय लोगों को आजीविका, शिक्षा और स्वास्थ्य के बजाय केवल विस्थापन और विनाश मिलता है।

संवैधानिक अधिकारों का हवाला: “ग्राम सभा ही सर्वोपरि”

सम्मेलन के मुख्य वक्ताओं, जिनमें सुरेश चंद्र सोय, माधव चंद्र कुंकल, रेयांस सायड और दिनकर कच्छप शामिल थे, ने सरकार को कड़ा संदेश दिया। उन्होंने निम्नलिखित कानूनी प्रावधानों पर जोर दिया जिसमें पांचवीं अनुसूची और अनुच्छेद 244(1) के तहत आदिवासियों के विशेष अधिकारों का संरक्षण।पेसा 1996 के तहत स्वशासन और ग्राम सभा की शक्ति।वन अधिकार कानून 2006 के तहत जल-जंगल-जमीन पर सामुदायिक हक।भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत बिना सहमति जमीन लेने पर रोक।”हम विकास विरोधी नहीं हैं, लेकिन हम उस मॉडल को स्वीकार नहीं करेंगे जो गांवों को कमजोर कर बाहरी कॉरपोरेट हितों को मजबूत करे।”— वक्ताओं का साझा बयान।

सम्मेलन के मुख्य प्रस्ताव और मांगें

सभा के अंत में सर्वसम्मति से कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए किसी भी प्रशासनिक दबाव या कॉरपोरेट हित वाली नीति का संवैधानिक तरीके से विरोध होगा। दलमा के लिए गांव केंद्रित और पर्यावरण के अनुकूल समग्र विकास प्लान की मांग।दलमा की पहाड़ियों को केवल पत्थर नहीं, बल्कि सामूहिक धरोहर माना जाए।

प्रमुख व्यक्तित्वों की उपस्थिति

इस महा-सम्मेलन में राधाकृष्णन सिंह मुंडा, जगन्नाथ सिंह मुंडा, धनंजय शुक्ला, टोनी दिप्ती मेरी मिंज, राकेश रंजन माहतो (विस्थापित अधिकार मंच) सहित सैकड़ों ग्राम प्रधान, मांझी और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। पहाड़िया और सबर समुदाय के प्रतिनिधियों ने भी अपनी पारंपरिक पहचान बचाने का संकल्प लिया।

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