जमशेदपुर:पूर्व सांसद एवं बिहार पीपुल्स पार्टी के संस्थापक आनंद मोहन ने जमशेदपुर में झारखंड राज्य गठन के मूल उद्देश्यों, वर्तमान विकास दर, युवाओं के आंदोलन और देश की आरक्षण नीति पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि झारखंड अलग राज्य बनने के ढाई दशक बाद भी आंदोलनकारियों और शहीदों के सपनों को धरातल पर पूरी तरह साकार नहीं किया जा सका है।
“बिहार ने की प्रगति, प्रचुर खनिजों के बाद भी पिछड़ा झारखंड”
राज्य के विकास मॉडल पर तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए आनंद मोहन ने कहा राज्य गठन के समय यह माना गया था कि खनिज संपन्न क्षेत्र अलग होने से बिहार पिछड़ जाएगा और झारखंड तेजी से आगे बढ़ेगा।मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कुशल नेतृत्व में बिहार ने आधारभूत संरचना, सुशासन और कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की। इसके विपरीत, देश की प्रचुर खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों से लबरेज होने के बावजूद झारखंड अपनी वास्तविक क्षमताओं के अनुरूप सामाजिक व आर्थिक प्रगति हासिल नहीं कर पाया। इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व के साथ समाज के प्रबुद्ध वर्ग की उदासीनता भी जिम्मेदार है।
पेपर लीक और छात्र आंदोलनों पर जताई चिंता
प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और युवाओं के आक्रोश पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व सांसद ने कहा ग्रामीण क्षेत्रों में अभिभावक कर्ज लेकर बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं। परीक्षाओं में धांधली और प्रश्नपत्र लीक होने से युवाओं का भविष्य अंधकारमय होता है। ऐसी स्थिति में सड़कों पर युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक है। सरकारों को दमनकारी रवैया अपनाने के बजाय युवाओं की जायज मांगों को सुनना चाहिए और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लानी चाहिए।
आरक्षण व्यवस्था पर दिया बड़ा सुझाव: ‘संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के परिवारों को बाहर होने पर करना चाहिए विचार ‘
आरक्षण और सामाजिक न्याय की नीतियों पर बोलते हुए आनंद मोहन ने एक नई बहस को जन्म दिया है। उन्होंने सुझाव दिया कि जो लोग आरक्षण का लाभ लेकर उच्च प्रशासनिक , राजनीतिक या संवैधानिक पदों तक पहुंच चुके हैं, उनके परिजनों को आरक्षण की परिधि से बाहर करने पर गंभीर विचार होना चाहिए। उनका तर्क है कि इस तरह के सुधार से आरक्षण का वास्तविक लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े उन जरूरतमंदों तक पहुंचेगा, जो आज भी विकास की मुख्यधारा से कटे हुए हैं।उन्होंने अंत में कहा कि झारखंड गठन के 26वें वर्ष में प्रवेश के इस दौर में राज्य के संसाधनों के सही दोहन और सामाजिक नीतियों की व्यापक समीक्षा करने की सख्त आवश्यकता है।
