जमशेदपुर में बारिश ने बढ़ाई कुम्हारों की चिंता, दीपावली से पहले दीये सुखाने की चुनौती

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जमशेदपुर: दूसरों के घरों को रोशन करने के लिए मिट्टी के दीये गढ़ रहे कुम्हारों की निगाहें इन दिनों आसमान पर टिकी हैं। दीपावली नजदीक है, चाक तेजी से घूम रहे हैं और मिट्टी से दीये व खिलौने आकार ले रहे हैं। लेकिन बारिश ने कुम्हार परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। तैयार दीये समय पर सूखेंगे या नहीं, भट्ठी में पकाने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा या नहीं और बाजार में बिक्री से लागत निकल पाएगी या नहीं—इन सवालों के बीच कारीगर त्योहार की तैयारी में जुटे हैं।चक्रवात ‘अर्णब’ से प्रभावित मौसम के बीच जमशेदपुर और आसपास के इलाकों में बारिश ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मौसम विभाग के 30 अक्टूबर के पूर्वानुमान में चार नवंबर तक बादल छाए रहने और एक-दो दौर में बारिश या गरज के साथ बौछारें पड़ने की संभावना जताई गई थी। ऐसे में दीपावली से पहले उत्पादन पूरा करना कुम्हारों के लिए चुनौती बन सकता है।

बारिश से दीये सुखाने और पकाने में परेशानी

मिट्टी के दीये बनाना केवल चाक पर उन्हें आकार देने तक सीमित नहीं है। इसके बाद उन्हें अच्छी तरह सुखाना, भट्ठी में पकाना और फिर बाजार में बिक्री के लिए तैयार करना पड़ता है। लगातार नमी और धूप की कमी से कच्चे दीयों को सूखने में अधिक समय लगता है। अधसूखे दीयों को भट्ठी में पकाने पर उनके टूटने या खराब होने का खतरा भी रहता है।खुले स्थानों पर रखे दीयों और मिट्टी के खिलौनों को बारिश से बचाना भी आसान नहीं है। मौसम की मार से तैयार माल खराब होने का डर कारीगरों की चिंता बढ़ा रहा है। उत्पादन में देरी का सीधा असर त्योहार से पहले होने वाली बिक्री पर पड़ सकता है।

त्योहार से पहले उत्पादन पूरा करने की चुनौती

दीपावली आठ नवंबर को मनाई जानी है। ऐसे में कुम्हारों के पास दीये बनाने, उन्हें सुखाने, पकाने और बाजार तक पहुंचाने के लिए सीमित समय बचा है। यदि बारिश के कारण काम प्रभावित होता है, तो त्योहार के ठीक पहले बढ़ने वाली मांग का पूरा लाभ मिलना मुश्किल हो सकता है।दीये और मिट्टी के खिलौनों की बिक्री काफी हद तक त्योहार की मांग पर निर्भर करती है। ऐसे में कुछ दिनों की देरी भी कारीगरों की कमाई पर असर डाल सकती है। उनके सामने चुनौती केवल अधिक उत्पादन करने की नहीं, बल्कि तैयार सामान को सुरक्षित रखते हुए समय पर बाजार तक पहुंचाने की भी है।

स्थानीय उत्पादों की मांग से बंधी उम्मीदें

त्योहारों के दौरान मिट्टी के दीये खरीदने और स्थानीय कारीगरों के उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील की जाती है। इससे कुम्हार परिवारों को बिक्री बढ़ने की उम्मीद रहती है। हालांकि, कारीगरों के लिए उचित कीमत मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।मिट्टी जुटाने और तैयार करने से लेकर दीये बनाने, सुखाने, पकाने और बाजार तक पहुंचाने में परिवार के कई सदस्यों की मेहनत लगती है। इसके बावजूद यदि बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई या लागत के अनुरूप कीमत नहीं मिली, तो त्योहार की कमाई प्रभावित हो सकती है।

नई पीढ़ी के सामने पुश्तैनी हुनर बचाने की चुनौती

कुम्हारों के लिए यह कारोबार केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक कला भी है। पुरानी पीढ़ी चाक के सहारे इस हुनर को आगे बढ़ा रही है। लेकिन मौसम की अनिश्चितता, बाजार की बदलती मांग और मेहनत के अनुरूप आमदनी की चिंता नई पीढ़ी को इस पेशे से दूर कर सकती है।युवाओं के सामने सवाल केवल पुश्तैनी हुनर सीखने का नहीं, बल्कि उससे नियमित आमदनी हासिल करने का भी है। स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के साथ कारीगरों को बेहतर बाजार और उचित मूल्य मिलना इस पारंपरिक व्यवसाय को आगे बढ़ाने में मददगार हो सकता है।फिलहाल कुम्हार परिवार दीपावली से पहले अधिक से अधिक दीये और मिट्टी के खिलौने तैयार करने में जुटे हैं। इस बार उनकी कमाई बाजार की मांग के साथ मौसम पर भी निर्भर करेगी। चाक पर आकार लेती हर मिट्टी की लौ के साथ उन्हें उम्मीद है कि दीपावली पर दूसरों के घरों के साथ उनका अपना घर भी रोशन होगा।

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