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पटना: पेड़ केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि मनुष्य की स्मृतियों, संस्कृति और जीवन के अनुभवों के भी अभिन्न अंग हैं। बचपन, परिवार, गांव और लोकपरंपराओं से जुड़े इन्हीं भावनात्मक रिश्तों को केंद्र में रखकर लेखिका विनीता परमार की पुस्तक ‘उन पेड़ों की याद’ पर बापू टावर, गर्दनीबाग, पटना में चर्चा आयोजित की गई। बापू टावर और नेचर संस्था के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में साहित्य, पर्यावरण और संस्कृति से जुड़े लेखक, बुद्धिजीवी तथा पाठक शामिल हुए।पुस्तक पर चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि पेड़ों को केवल वनस्पति या पर्यावरण के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं है। वे मनुष्य के पारिवारिक जीवन, खानपान, लोकविश्वासों, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक स्मृतियों से भी गहराई से जुड़े हैं। पुस्तक इन संबंधों को संस्मरणों और रेखाचित्रात्मक गद्य के माध्यम से सामने लाती है।
पेड़ों से जुड़ी स्मृतियों को सहेजने की पहल
कार्यक्रम की अध्यक्षता बापू टावर के निदेशक विनय कुमार ने की, जबकि संचालन चंद्रबिंद सिंह ने किया। नेचर संस्था की संरक्षक कविता परमार ने स्वागत भाषण दिया और पुस्तक के संदर्भ में अपने विचार रखे।उन्होंने कहा कि पेड़ों से जुड़ी स्मृतियां लोगों को अपने बचपन और जीवन के उन दिनों में लौटने का अवसर देती हैं, जिनसे उनका भावनात्मक रिश्ता रहा है। ये स्मृतियां केवल व्यक्तिगत नहीं होतीं, बल्कि एक पूरे समाज और पीढ़ी के अनुभवों को भी अपने भीतर समेटे रहती हैं।चर्चा में वरिष्ठ कथाकार हृषीकेश सुलभ, वरिष्ठ लेखक कमलेश, यादवेन्द्र, ललित कुमार सिंह और डॉ. कविता परमार ने पुस्तक के विभिन्न पक्षों पर अपने विचार रखे।
हृषीकेश सुलभ ने कथेतर गद्य की ताकत पर की चर्चा
वरिष्ठ कथाकार हृषीकेश सुलभ ने कहा कि अच्छे कथेतर गद्य की विशेषता यह है कि उसे पढ़ते हुए पाठक अपनी स्मृतियों की यात्रा पर निकल पड़ता है। लेखक के अनुभवों से गुजरते हुए पाठक अपने जीवन के उन प्रसंगों तक पहुंचता है, जिन्हें शायद लंबे समय से याद नहीं किया हो।उन्होंने पुस्तक में वर्णित करजनी, बरगद और हरसिंगार जैसे पेड़ों का उल्लेख करते हुए उनसे जुड़ी स्मृतियां साझा कीं। उन्होंने रेखांकित किया कि पेड़ केवल प्राकृतिक जीव नहीं हैं, बल्कि मनुष्य के समय, अनुभव और भावनात्मक संसार के भी साक्षी हैं। उनसे जुड़ी एक स्मृति पूरे परिवार, परिवेश और बीते समय को जीवंत कर सकती है।
पेड़ मनुष्य के संस्कारों और जीवन से जुड़े हैं : ललित कुमार सिंह
ललित कुमार सिंह ने कहा कि पेड़ों के नीचे खड़े होने का अनुभव मनुष्य के भीतर एक अलग तरह की चेतना जगाता है। उन्होंने डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पुस्तक का उल्लेख करते हुए अर्जुन के पेड़ से जुड़े प्रसंग को याद किया।विनीता परमार की पुस्तक में आम, पीपल और बरगद जैसे वृक्षों के संदर्भों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पेड़ मनुष्य के जीवन, मृत्यु, संस्कारों और सामाजिक व्यवहार से जुड़े रहते हैं। उनके अनुसार, यह पुस्तक पाठकों को पेड़ों को अधिक संवेदनशील दृष्टि से देखने के लिए प्रेरित करती है।
हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण पहल है पुस्तक : कमलेश
वरिष्ठ लेखक कमलेश ने ‘उन पेड़ों की याद’ को हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण पहल बताया। उन्होंने कहा कि पेड़ों और वनस्पतियों पर केंद्रित ऐसे संस्मरण और रेखाचित्र पाठकों को अपने आसपास के पेड़-पौधों से दोबारा जोड़ने में मदद कर सकते हैं।उन्होंने स्मृति और मनुष्य के संबंध पर विचार रखते हुए कहा कि अतीत से जुड़े रहना व्यक्ति को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। पुरानी स्मृतियां जीवन के अनुभवों को नया अर्थ देती हैं।कमलेश ने प्रकृति के साथ स्त्रियों के सहज संबंधों की चर्चा करते हुए झारखंड में लड़कियों के सामूहिक अनुभवों और ‘सहियापा’ की परंपरा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति से जुड़ाव केवल उपयोगिता तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें आत्मीयता, साझेदारी और संवेदना के कई स्तर शामिल हैं।
प्रकृति से दूरी मानवीय अनुभवों से दूरी भी है : यादवेन्द्र
वरिष्ठ लेखक यादवेन्द्र ने कहा कि पुस्तक असाधारण या दुर्लभ अनुभवों की दुनिया नहीं रचती, बल्कि उन साधारण अनुभवों को सामने लाती है, जो कभी हम सभी के जीवन का हिस्सा रहे हैं।उन्होंने कहा कि पेड़-पौधों के साथ मनुष्य का आत्मीय रिश्ता धीरे-धीरे कमजोर हुआ है। यह पुस्तक उस संबंध को फिर से याद करने का अवसर देती है। प्रकृति से दूर होना केवल पेड़ों से दूर होना नहीं, बल्कि जीवन के उन अनुभवों से भी दूर होना है, जो मनुष्य को मानवीय बनाते हैं।
साहित्य और पर्यावरण के संवाद पर दिया जोर
अध्यक्षीय वक्तव्य में बापू टावर के निदेशक विनय कुमार ने कहा कि पुस्तक पर हुई चर्चा ने स्पष्ट किया कि पेड़ों से जुड़ी व्यक्तिगत स्मृतियां भी सामूहिक अनुभव का हिस्सा होती हैं। वक्ताओं ने अपने अनुभवों के माध्यम से पुस्तक के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा और बताया कि यह पाठकों को अपनी स्मृतियों में लौटने के लिए प्रेरित करती है।उन्होंने कहा कि आज जीवन की गति तेज होने के साथ प्रकृति से मनुष्य का रिश्ता औपचारिक होता जा रहा है। ऐसे समय में पुस्तकों और साहित्यिक आयोजनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। पेड़ों को केवल पर्यावरण और वृक्षारोपण के आंकड़ों तक सीमित रखने के बजाय उनसे जुड़े परिवार, परंपरा, खानपान और लोकजीवन को समझना भी जरूरी है।उन्होंने साहित्य और पर्यावरण के बीच संवाद को समय की आवश्यकता बताते हुए लेखिका को पुस्तक के लिए बधाई दी।
लेखिका ने पुस्तक को बताया ‘इको-कल्चरल मेमोयर’
चर्चा के अंत में लेखिका विनीता परमार ने पुस्तक की रचना-प्रक्रिया और उसके उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने इसे ‘इको-कल्चरल मेमोयर’ यानी पारिस्थितिकी और संस्कृति से जुड़ा संस्मरण बताया।उन्होंने स्पष्ट किया कि पुस्तक वनस्पतियों का वैज्ञानिक परिचय देने वाली पारंपरिक पुस्तक नहीं है, बल्कि पेड़ों के साथ जुड़े मनुष्यों, परिवारों, स्थानों और समय की स्मृतियों को दर्ज करने वाली गद्य-यात्रा है।विनीता परमार ने कहा कि पेड़ों को उन्होंने पहले विज्ञान की दृष्टि से जाना और समझा था, लेकिन उनके बारे में लिखते समय महसूस हुआ कि पेड़ केवल वनस्पति विज्ञान का विषय नहीं हैं। वे हमारी स्मृतियों, रसोई, लोकगीतों, लोककथाओं, रीति-रिवाजों और जीवन-पद्धतियों में भी गहराई से बसे हुए हैं।उन्होंने कहा कि पुस्तक के प्रत्येक संस्मरण में वनस्पति की अपनी कथा है और उसके साथ किसी मनुष्य के जीवन की कहानी भी चलती है। इस तरह पेड़ और मनुष्य एक-दूसरे के अनुभवों में शामिल दिखाई देते हैं।
स्मृतियों को दर्ज करना भी संरक्षण का एक रूप
लेखिका ने कहा कि किसी पेड़ को बचाने के लिए केवल उसके जैविक महत्व को समझना पर्याप्त नहीं है। उसके साथ समाज के भावनात्मक और सांस्कृतिक संबंधों को पहचानना भी जरूरी है। जब कोई पेड़ हमारी स्मृतियों से बाहर होने लगता है, तो वह धीरे-धीरे हमारे परिवेश से भी दूर हो सकता है।उन्होंने बताया कि पुस्तक लिखने के पीछे उनकी कोशिश उन पेड़ों, वनस्पतियों और उनसे जुड़े जीवन-अनुभवों को शब्दों में सुरक्षित रखने की रही है, जो बदलती जीवनशैली के कारण धीरे-धीरे विस्मृत होते जा रहे हैं।कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने उपस्थित अतिथियों, वक्ताओं और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इनमें सुशील कुमार, नरेन्द्र कुमार, प्रत्युष चंद्र मिश्रा, इंदु कुमारी, मुग्धा सिंह और मधु पांडेय सहित अन्य लोग शामिल रहे।पूरी चर्चा ने इस बात को रेखांकित किया कि प्रकृति का संरक्षण केवल पर्यावरणीय नीतियों और वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है। इसके लिए मनुष्य के भीतर प्रकृति के प्रति आत्मीयता और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी मजबूत करना जरूरी है। ‘उन पेड़ों की याद’ इसी संबंध को साहित्य के माध्यम से फिर से जीवंत करने का प्रयास है।
