
जमशेदपुर: लौहनगरी के आम बगान मैदान में शुक्रवार को सैकड़ों मेडिकल और सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एकजुट हुए। अवसर था 6 मार्च 1976 को लागू हुए ऐतिहासिक ‘सेल्स प्रमोशन एम्प्लॉईस (कंडीशन्स ऑफ सर्विस) एक्ट’ यानी SPE एक्ट के गौरवशाली इतिहास को याद करने का। इस दौरान दवा प्रतिनिधियों ने संकल्प लिया कि वे कॉरपोरेट दबाव में कमजोर किए जा रहे श्रम कानूनों की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करेंगे।
6 मार्च: दवा प्रतिनिधियों के लिए क्यों है खास?
संबोधित करते हुए वक्ताओं ने बताया कि 1976 में राज्यसभा की ‘कमेटी ऑन पिटिशन्स’ की सिफारिश पर लोकसभा से यह बिल पारित हुआ था। इसी कानून ने मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स को ‘अतिकुशल कर्मचारी’ का दर्जा दिलाया और नियुक्ति पत्र से लेकर सेवा शर्तों तक को कानूनी सुरक्षा प्रदान की। यह एक विशेष वर्ग के लिए बना अनोखा श्रम कानून है।
लेबर कोड के माध्यम से कानून खत्म करने की ‘साजिश’
समारोह के दौरान बी एस एस आर यूनियन के राज्य अध्यक्ष साथी के.डी. प्रताप और राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य साथी सुब्रतो बिस्वास ने केंद्र सरकार की नीतियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा स्थायी नौकरी को ‘फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट’ के दायरे में लाकर शिक्षित युवाओं का शोषण किया जा रहा है। नए लेबर कोड के माध्यम से यूनियन बनाने और सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार को कमजोर करने की साजिश हो रही है।छुट्टी के कानूनों और कार्यस्थल की शर्तों में श्रमिकों के बजाय मालिकों को फायदा पहुँचाया जा रहा है।
दवा की कीमतों और मुनाफाखोरी पर जताई चिंता
अखिल भारतीय संगठन FMRAI और BSSR यूनियन लंबे समय से लागत मूल्य आधारित दवा नीति की मांग कर रहे हैं। नेताओं ने कहा कि 2014 के बाद से दवा का मूल्य निर्धारण ‘बाजार आधारित’ कर दिया गया है, जिससे जीवन रक्षक दवाएं महंगी हो रही हैं। संगठन ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा थोपे जा रहे पेटेंट कानून और दवा उद्योग में बढ़ती मुनाफाखोरी के खिलाफ भी आवाज बुलंद की।
श्रम मंत्रालय को भेजा ऑनलाइन पिटिशन
6 मार्च के इस अवसर पर देशभर के लाखों मेडिकल प्रतिनिधियों ने कानून की रक्षा का संकल्प लिया। जमशेदपुर के आम बगान में जुटे प्रतिनिधियों ने सामूहिक रूप से केंद्रीय श्रम मंत्रालय को ऑनलाइन पिटिशन भेजकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं और SPE एक्ट को यथावत रखने की मांग की।
