जमशेदपुर: लौहनगरी जमशेदपुर में आज प्रकृति पर्व ‘सरहुल’ की भव्य छटा देखने को मिली। केंद्रीय सरहुल पूजा समिति के तत्वावधान में आयोजित मुख्य महोत्सव में हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़े, जिससे पूरा शहर उत्सव के माहौल में सराबोर नजर आया। जल, जंगल और जमीन की आराधना के इस महापर्व पर आदिवासी संस्कृति और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिला।
पारंपरिक वेशभूषा और नृत्य का आकर्षण
महोत्सव के दौरान शहर की सड़कों पर सांस्कृतिक विरासत की सुंदर झलक दिखाई दी। बड़ी संख्या में महिला और पुरुष अपनी पारंपरिक वेशभूषा (सफेद और लाल पाढ़ की साड़ी व धोती) में सज-धजकर शामिल हुए। मांदर और नगाड़ों की थाप पर थिरकते नर्तक दलों ने अपनी कला से सभी का मन मोह लिया। पारंपरिक गीतों और संगीत ने पूरे वातावरण को उत्साह और उमंग से भर दिया।
प्रकृति पूजा और एकता का संदेश
महोत्सव के दौरान विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जहाँ वक्ताओं ने सरहुल के आध्यात्मिक और पर्यावरणीय महत्व पर प्रकाश डाला। लोगों ने साल (सखुआ) के वृक्ष की पूजा कर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया और पर्यावरण बचाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में शामिल अतिथियों और समाज के प्रबुद्ध जनों ने इस पर्व के माध्यम से समाज में एकता, शांति और आपसी भाईचारे का संदेश दिया।
शहर भर में रही उत्सव की रौनक
जमशेदपुर के विभिन्न इलाकों से निकली शोभायात्राएं आकर्षण का केंद्र रहीं। केंद्रीय समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि इस बार युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति विशेष उत्साह देखा गया। कार्यक्रम के सफल संचालन के लिए सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किए गए थे और स्वयंसेवकों की टीम यातायात को सुचारू बनाने में जुटी रही।
“सरहुल हमारी पहचान और प्रकृति के प्रति हमारे समर्पण का पर्व है। आज की यह भीड़ और उत्साह बताता है कि हम अपनी जड़ों से कितनी मजबूती से जुड़े हैं।” —पदाधिकारी, केंद्रीय सरहुल पूजा समिति
