Views: 46
जमशेदपुर: प्रकाश और उत्सव के महापर्व दीवाली की खुशियां जहां हर घर को जगमगा रही हैं, वहीं इस उत्सव के असली शिल्पकार यानी माटी के दीये गढ़ने वाले कुम्हारों के घरों में भी रोशनी पहुंचाने के लिए समाज के प्रबुद्ध वर्ग आगे आ रहे हैं। इसी कड़ी में झारखंड की पूर्व सांसद सुमन महतो ने दीवाली के अवसर पर स्थानीय कुम्हारों के घर पहुंचकर उनके साथ वक्त बिताया, खुद चाक चलाकर दीये तैयार किए और समाज से स्वदेशी व हस्तनिर्मित माटी के दीयों को अपनाकर कुम्हारों का मनोबल बढ़ाने की पुरजोर अपील की।
चाक पर हाथ रख गढ़े दीये, कुम्हारों के संघर्ष को किया नमन
दीवाली से ठीक पहले पूर्व सांसद सुमन महतो पारंपरिक चाक पर बैठीं और कुम्हारों के साथ मिलकर मिट्टी के दीये तैयार किए। इस दौरान उन्होंने कुम्हारों के हुनर, उनकी मेहनत और इस पुश्तैनी कला के संघर्ष को बहुत करीब से महसूस किया।कुम्हारों के चेहरे पर उम्मीद की एक नई चमक जगाते हुए उन्होंने कहा कि “चाक पर घूमती मिट्टी केवल दीये नहीं गढ़ती, बल्कि इन मेहनतकश परिवारों के सालभर के सपनों और उम्मीदों को आकार देती है।” उन्होंने आम जनता से अपील की कि वे इस दीवाली विदेशी या कृत्रिम लाइटों के बजाय मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता दें, ताकि हर कुम्हार के घर में भी सच्चे अर्थों में दीवाली मनाई जा सके।
“ज़रा सी आस पाली है, मेरी मेहनत खरीदो लोगों… मेरे घर भी दीवाली है”
यह पंक्तियां सिर्फ कुछ शब्द नहीं, बल्कि उन लाखों कुम्हारों की पुकार हैं जो अपनी पूरी मेहनत से दीयों को सुंदर रूप देते हैं ताकि हमारे घर रोशन हो सकें। आधुनिकता की दौड़ में जहां चाईनीज झालरों और प्लास्टिक के सामानों ने बाजार में जगह बना ली है, वहीं मिट्टी के दीये बनाने वाले पारंपरिक कारीगर आज भी आर्थिक तंगी और संघर्ष का सामना कर रहे हैं।सुमन महतो ने इस बात पर जोर दिया कि कुम्हारों की मेहनत का सही मूल्य चुकाना ही उनके प्रति सच्ची संवेदना और सम्मान है। जब हम स्थानीय चाक से बने दीये खरीदते हैं, तो हम केवल एक वस्तु नहीं खरीदते, बल्कि किसी गरीब परिवार के घर में खुशियों का दीया प्रज्वलित करते हैं।
आत्मनिर्भरता और वोकल फॉर लोकल का संदेश
पूर्व सांसद ने कहा कि हमारे देश के कुम्हार हमारी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के जीवित प्रतीक हैं। इनकी कला को संरक्षित रखना हम सबका नैतिक दायित्व है। उन्होंने युवाओं और शहरवासियों से विशेष आग्रह किया कि वे इस दीवाली मिट्टी के दीये, कलश और मूर्तियां स्थानीय कुम्हारों से ही खरीदें और ‘वोकल फॉर लोकल’ के संकल्प को मजबूत करें।सुमन महतो के इस संवेदनशीलता भरे कदम से न केवल कुम्हारों का मनोबल बढ़ा है, बल्कि समाज को भी यह संदेश मिला है कि उत्सव की असली खुशी अपनों के साथ-साथ उन लोगों के जीवन में उजाला करने से मिलती है जो हमारे समाज की रीढ़ हैं।
