
पोटका : जिले के पोटका प्रखंड से स्थानीय स्वशासन और नियमों के उल्लंघन का एक गंभीर मामला सामने आया है। यहाँ के ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि ग्राम सभा को अंधेरे में रखकर कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा मनमाने ढंग से धार्मिक ट्रस्ट का गठन किया गया है और मंदिर परिसर की सार्वजनिक भूमि पर भवन निर्माण कराया जा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, यह सीधे तौर पर पेसा अधिनियम और पंचायती राज व्यवस्था के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।
पेसा नियमों की अनदेखी का आरोप
ग्रामीण अमित टुडू और अन्य स्थानीय निवासियों का कहना है कि झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की अनुमति के बिना भूमि या सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ा कोई भी निर्णय नहीं लिया जा सकता। लेकिन इस मामले में गोपनीय तरीके से ट्रस्ट का गठन: बिना किसी सार्वजनिक सूचना या ग्राम सभा की बैठक के धार्मिक ट्रस्ट का पंजीकरण करा लिया गया। मंदिर परिसर के आसपास की भूमि, जो गांव की साझा संपत्ति है, उस पर भवन निर्माण शुरू कर दिया गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव के संसाधनों से जुड़े फैसले कुछ लोग बंद कमरों में ले रहे हैं, जिससे गांव में असंतोष और तनाव व्याप्त है।
सार्वजनिक राशि के दुरुपयोग की आशंका
ग्रामीणों ने केवल निर्माण पर ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक कोष के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मंदिर और सामाजिक कार्यों के लिए एकत्रित की गई राशि का उपयोग किन आधारों पर और किसकी अनुमति से किया जा रहा है, इसकी कोई जानकारी ग्राम सभा को नहीं दी गई है। उन्होंने इस मामले में वित्तीय अनियमितता और राशि के दुरुपयोग की गहरी आशंका जताई है।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
आक्रोशित ग्रामीणों ने प्रशासन से इस मामले में हस्तक्षेप की अपील करते हुए निम्नलिखित मांगें रखी हैं। धार्मिक ट्रस्ट के गठन, उसके पंजीकरण और मंदिर परिसर में हो रहे निर्माण कार्य की उच्च स्तरीय जांच हो। बिना ग्राम सभा की सहमति के लिए गए सभी प्रशासनिक और वित्तीय निर्णयों को तत्काल रद्द किया जाए। कानून का उल्लंघन कर मनमाने ढंग से कार्य करने वाले लोगों को चिन्हित कर उन पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।भविष्य में गांव के किसी भी महत्वपूर्ण या सार्वजनिक मामले में ग्राम सभा की अनिवार्य अनुमति सुनिश्चित की जाए।
क्या कहता है पेसा कानून?
झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून के तहत ग्राम सभा को गांव की परंपराओं, धार्मिक स्थलों और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या निर्माण से पहले ग्राम सभा का अनापत्ति प्रमाण पत्र अनिवार्य होता है। ग्रामीणों का कहना है कि इस मामले में इन सभी संवैधानिक अधिकारों को कुचला गया है।
