
जमशेदपुर: झारखंड के लोक-संस्कृति के सबसे बड़े पर्व ‘टुसू’ और मकर संक्रांति को लेकर उत्सव का उल्लास आसमान पर है। मंगलवार को जमशेदपुर के विभिन्न बाजारों और मूर्तिकारों के केंद्रों से ‘माँ टुसू’ की सुंदर प्रतिमाओं को अपने घरों और गांवों की ओर ले जाने की होड़ मची रही। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीतों के बीच श्रद्धालु माता टुसू की विदाई कराकर अपने गंतव्य की ओर रवाना हुए।
छोटे से लेकर विशाल आकार तक की प्रतिमाओं का आकर्षण
शहर के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर मानगो, साकची, आदित्यपुर और जुगसलाई में मूर्तिकारों के यहाँ सुबह से ही भीड़ उमड़ पड़ी थी।बाजार में डेढ़-दो फीट की छोटी और प्यारी प्रतिमाओं से लेकर 10 फीट से भी ऊंची भव्य प्रतिमाएं आकर्षण का केंद्र रहीं। बंगाल और झारखंड के कारीगरों द्वारा बनाई गई इन प्रतिमाओं को चटख रंगों और पारंपरिक वेशभूषा से सजाया गया है।
सड़कों पर दिखा उत्सव का अनूठा रंग
मूर्तियों को गंतव्य तक ले जाने के दृश्य ने सड़कों को रंगों से भर दिया। श्रद्धा ऐसी कि लोग अपने सामर्थ्य अनुसार साधनों का प्रयोग कर रहे हैं। छोटी प्रतिमाओं को श्रद्धालु बड़े ही जतन से हाथों में लेकर या बाइक पर पीछे बैठकर सुरक्षित ले जाते दिखे।बड़ी और भव्य प्रतिमाओं को ले जाने के लिए ऑटो-रिक्शा, ट्रैक्टर और पिकअप वैन का सहारा लिया गया। कई जगहों पर युवा टुसू गीतों पर थिरकते हुए प्रतिमा के साथ आगे बढ़ रहे थे।
आस्था और परंपरा का संगम
टुसू मुख्य रूप से अविवाहित लड़कियों और किसानों का त्योहार माना जाता है, जो फसल कटाई की खुशी और माता टुसू की आराधना से जुड़ा है। 14 जनवरी यानी मकर संक्रांति के दिन इन प्रतिमाओं की विधिवत पूजा होगी और अगले दिन इन्हें नदियों व सरोवरों में विसर्जित किया जाएगा।
बाजारों में रौनक, बढ़ी मांग
मूर्तिकारों का कहना है कि इस वर्ष टुसू प्रतिमाओं की मांग में काफी बढ़ोतरी हुई है। पिछले दो दिनों से काम का भारी दबाव था, लेकिन आज विदाई के दिन ग्राहकों के चेहरे की खुशी उनकी मेहनत सफल कर रही है। प्रतिमाओं के साथ-साथ ‘चौड़ल’ (बांस के बने रंगीन ढांचे) की भी खूब बिक्री हुई।
