
जमशेदपुर : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा हाल ही में जारी की गई एक अधिसूचना को लेकर देश भर में नई बहस छिड़ गई है। सवर्ण महासंघ फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने इस अधिसूचना को भेदभावपूर्ण बताते हुए केंद्र सरकार से इस पर पुनर्विचार करने और इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है। संगठन का तर्क है कि मौजूदा नियम शैक्षणिक परिसरों में समानता के बजाय असंतुलन और भय का माहौल पैदा कर सकते हैं।
न्याय सभी के लिए हो, किसी एक पक्ष के लिए नहीं
संगठन की ओर से केंद्र सरकार को भेजे गए एक पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी कानून या नियम का प्राथमिक उद्देश्य समाज के सभी वर्गों के लिए न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए। फाउंडेशन ने आपत्ति जताई है कि नई अधिसूचना एक विशेष वर्ग के पक्ष में झुकी हुई है, जिससे शैक्षणिक संस्थानों में असंतुलन उत्पन्न होने की पूरी आशंका है।
झूठी शिकायतों पर दंड के प्रावधान का अभाव
पत्र में इस बात का विशेष उल्लेख किया गया है कि अधिसूचना के प्रारंभिक ड्राफ्ट में ओबीसी वर्ग को शामिल नहीं किए जाने पर विवाद हुआ था। हालांकि, बाद में उन्हें शामिल तो कर लिया गया, लेकिन फर्जी शिकायतों को रोकने के लिए कोई ठोस दंडात्मक प्रावधान नहीं रखा गया है।”बिना दंडात्मक प्रावधान के, इस नियम का दुरुपयोग होने की संभावना बढ़ जाएगी, जिससे निर्दोष छात्रों और शैक्षणिक कर्मचारियों का मानसिक उत्पीड़न हो सकता है।” — सवर्ण महासंघ फाउंडेशन
140 करोड़ की आबादी और संवैधानिक अधिकारों का हवाला
संगठन ने देश की अनुमानित 140 करोड़ आबादी का संदर्भ देते हुए कहा कि सामान्य वर्ग की एक बड़ी जनसंख्या के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। फाउंडेशन के अनुसार परिसरों में असुरक्षा और अविश्वास की भावना पैदा होगी।नए नियम समान अवसर के सिद्धांत को कमजोर कर सकते हैं। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए जो समावेशी हो और जिसमें किसी भी वर्ग के साथ पक्षपात न हो।
‘रोलबैक’ नहीं हुआ तो होगा आंदोलन
सवर्ण महासंघ फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने दोटूक शब्दों में कहा है कि यदि सरकार इस अधिसूचना को वापस नहीं लेती है और सभी वर्गों के छात्रों के हितों को ध्यान में रखकर संतुलित नीति नहीं बनाती है, तो संगठन चुप नहीं बैठेगा। संगठन ने स्पष्ट किया है कि वे संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज कराएंगे और इसके लिए बड़े स्तर पर आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
