
जमशेदपुर: रंगों के त्योहार होली को पर्यावरण के अनुकूल और सामाजिक रूप से सार्थक बनाने के लिए फ्रेंड्स ऑफ ट्राइबल्स सोसाइटी युवा और सारथी एनजीओ ने हाथ मिलाया है। इस संयुक्त पहल के तहत मंदिरों में अर्पित किए गए पवित्र फूलों को रीसायकल कर 100% प्राकृतिक और सुरक्षित हर्बल गुलाल तैयार किया जा रहा है।
आस्था और पर्यावरण का संगम: फूलों से गुलाल तक
अक्सर मंदिरों में चढ़ाए गए फूल अगले दिन कचरे का हिस्सा बन जाते हैं। इस पहल के जरिए उन फूलों को एकत्र कर सुखाया जाता है और फिर प्राकृतिक प्रक्रियाओं से गुलाल तैयार किया जाता है। रसायनों से मुक्त यह गुलाल न केवल त्वचा के लिए सुरक्षित है, बल्कि जल और मिट्टी को भी प्रदूषित नहीं करता।अर्पित फूलों का सदुपयोग कर भारतीय संस्कृति और आस्था का सम्मान किया जा रहा है।
महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता
यह प्रोजेक्ट केवल गुलाल बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के लिए रोजगार का एक बड़ा जरिया बन गया है। स्थानीय महिलाएं गुलाल निर्माण, आकर्षक पैकेजिंग और मार्केटिंग का प्रशिक्षण ले रही हैं। इस कार्य से जुड़कर महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं।संस्थापक पूजा अग्रवाल ने बताया कि उनका संगठन कौशल विकास और स्वदेशी मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कार्यरत है।
संस्कार और समाजसेवा से जुड़ रही नई पीढ़ी
एफटीएस युवा की अध्यक्ष रश्मि गर्ग ने कहा कि उनका संगठन शहर और गांव के बीच एक सेतु का कार्य कर रहा है। इस दौरान एफटीएस किड्स की अद्विका काबरा और काश्वी गर्ग ने भी गुलाल बनाने के अपने अनुभव साझा किए, जो पर्यावरण के प्रति बच्चों की बढ़ती जागरूकता का प्रमाण है।
प्रमुख विचार और संदेश
सुनील बागरोडिया ने एकल विद्यालय के माध्यम से दूरस्थ गांवों में दी जा रही संस्कारयुक्त शिक्षा के महत्व को बताया।निधि मित्तल (कोषाध्यक्ष) ने ‘वनयात्रा’ के माध्यम से जमीनी स्तर पर जुड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।राजेश मित्तल ने वनवासी समाज के शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण के कार्यों की जानकारी दी।
