आषाढ़ी पूजा 2026: बर्मामाइंस में रजक समाज ने पारंपरिक रीति-रिवाजों से की पूजा, सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना

जमशेदपुर: झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक आषाढ़ी पूजा पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। सावन माह के आगमन से पहले आयोजित होने वाली इस पारंपरिक पूजा का उद्देश्य अच्छी वर्षा, भरपूर फसल, सुख-समृद्धि और सामाजिक खुशहाली की कामना करना है। बदलते दौर में भी ग्रामीण समाज इस लोक परंपरा को पूरी आस्था के साथ निभा रहा है और नई पीढ़ी भी इसमें बढ़-चढ़कर भाग ले रही है।

बर्मामाइंस में रजक समाज ने पारंपरिक विधि-विधान से किया आयोजन

इसी क्रम में जमशेदपुर के बर्मामाइंस स्थित रजक समाज की ओर से पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आषाढ़ी पूजा का आयोजन किया गया। सुबह से ही समाज के महिला, पुरुष और बच्चे पूजा स्थल पर एकत्र हुए। वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक विधि-विधान के बीच पूजा संपन्न हुई। श्रद्धालुओं ने गांव, समाज और परिवार की सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना करते हुए देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त किया।

सात देवियों और एक देवता की होती है विशेष पूजा

समाज के सदस्य नेहाल ने बताया कि आषाढ़ी पूजा में सात देवियों और एक देवता की विशेष आराधना की जाती है। लोक मान्यता है कि इन देवी-देवताओं की कृपा से गांव में खुशहाली बनी रहती है, प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा होती है और किसानों की फसल अच्छी होती है। उन्होंने कहा कि यह पूजा प्रकृति और कृषि आधारित लोक आस्था का प्रतीक है, जिसे पूर्वजों से विरासत के रूप में आज की पीढ़ी तक पहुंचाया गया है।

परंपरा के अनुसार निभाई जाती है बलि प्रथा

नेहाल ने बताया कि इस पूजा में वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार बलि प्रथा का भी पालन किया जाता है, जिसे समाज अपनी धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा मानता है। पूजा के दौरान बच्चों के उज्ज्वल भविष्य, परिवार की खुशहाली, समाज की उन्नति और आपसी भाईचारे की कामना की गई। पूजा के बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया।

लोक संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक है आषाढ़ी पूजा

ग्रामीणों का कहना है कि आषाढ़ी पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि झारखंड की लोक संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह पर्व लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत, पूर्वजों और प्रकृति से जोड़ने के साथ-साथ सामूहिक सहयोग, सद्भाव और सामाजिक समरसता का संदेश भी देता है। सावन के स्वागत से पहले मनाया जाने वाला यह पर्व आज भी ग्रामीण जीवन की आस्था और परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।

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