रांची: संख्या बल पर भारी पड़ा नाथवानी का ‘गणित’; महागठबंधन के किले में सेंध लगा चौथी बार राज्यसभा पहुंचे कॉरपोरेट किंग परिमल नाथवानी

रांची : झारखंड के संसदीय इतिहास में 2026 का राज्यसभा चुनाव एक ऐसे टर्निंग पॉइंट के रूप में दर्ज हो गया है, जिसने राज्य के सियासी धुरंधरों को उनके ही घर में मात दे दी। संख्या बल के हिसाब से कागज पर बेहद मजबूत दिख रहे सत्तारूढ़ इंडिया (महागठबंधन) को पटखनी देते हुए भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने एक बार फिर झारखंड की राजनीति में ऐतिहासिक वापसी की है।56 विधायकों के भारी-भरकम समर्थन का दम भरने वाला मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कुनबा और 16 विधायकों व चार मंत्रियों वाली कांग्रेस अपने प्रत्याशी प्रणव झा को संसद की दहलीज तक नहीं पहुंचा सकी। चुनाव नतीजों के बाद से ही हताश कांग्रेस और झामुमो नेता अब परिमल नाथवानी पर धनबल और विधायकों की ‘खरीद-फरोख्त’ (क्रॉस वोटिंग) का खुला आरोप लगा रहे हैं।

कभी बेचते थे कोल्ड ड्रिंक और साबुन, आज हैं रिलायंस के संकटमोचक

इस बड़ी सियासी जंग को जीतने वाले परिमल नाथवानी की निजी और व्यावसायिक यात्रा किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। 1 फरवरी 1956 को जन्मे और मूल रूप से गुजरात से ताल्लुक रखने वाले नाथवानी की शुरुआत बेहद साधारण रही। एक दौर था जब वे अपनी आजीविका के लिए कोल्ड ड्रिंक और साबुन बेचने जैसा छोटा काम करते थे। अपने कड़े संघर्ष और अद्वितीय बिजनेस मैनेजमेंट के दम पर उन्होंने कॉरपोरेट जगत में कदम रखा। आज वे रिलायंस इंडस्ट्रीज में कॉर्पोरेट अफेयर्स के निदेशक हैं और उन्हें मुकेश अंबानी के सबसे भरोसेमंद और करीबी रणनीतिकारों में गिना जाता है। धीरूभाई अंबानी के जमाने से ही वे रिलायंस समूह के संकटमोचक रहे हैं।

झारखंड से पुराना नाता: तीसरी बार इस राज्य से पहुंचे संसद

उद्योग जगत का यह बड़ा चेहरा राजनीति के मैदान में नया नहीं है। परिमल नाथवानी का राज्यसभा का सफरनामा बेहद दिलचस्प है। नाथवानी ने पहली बार साल 2008 में झारखंड की धरती से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राज्यसभा का चुनाव जीतकर सबको चौंकाया था। इसके बाद 2014 में भी वे यहीं से दोबारा राज्यसभा पहुंचे।साल 2020 में झारखंड का कार्यकाल खत्म होने के बाद वे आंध्र प्रदेश चले गए, जहां वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के समर्थन से वे तीसरी बार राज्यसभा सदस्य चुने गए। अपना तीसरा कार्यकाल पूरा करने के बाद 2026 में उन्होंने एक बार फिर अपनी पुरानी कर्मभूमि झारखंड का रुख किया और चौथी बार संसद पहुंचने में कामयाब रहे।

कैसे ध्वस्त हुआ हेमंत सोरेन और कांग्रेस का चक्रव्यूह?

चुनावी गणित के अनुसार, कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की जीत तय मानी जा रही थी। झामुमो, कांग्रेस, राजद और वाम दलों के पास जीत के जादुई आंकड़े से कहीं अधिक विधायक थे। लेकिन वोटिंग के दिन पर्दे के पीछे चली लंबी सियासी बिसात ने पूरा पासा पलट दिया। ऐन वक्त पर महागठबंधन के भीतर हुए वोटों के बिखराव और बड़े पैमाने पर हुई ‘क्रॉस वोटिंग’ ने कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। नाथवानी को उम्मीद से कई गुना ज्यादा प्रथम वरीयता के वोट मिले।विपक्ष जहां इसे ‘मनी पावर’ की जीत बता रहा है, वहीं भाजपा और नाथवानी समर्थकों का साफ कहना है कि यह परिमल नाथवानी की स्वीकार्यता, उनकी राजनीतिक समझ और विकासवादी सोच की जीत है।

परिणाम के बाद खड़े हुए कई तीखे सुलगते सवाल

परिमल नाथवानी की इस धमाकेदार जीत ने झारखंड के सत्ताधारी दल के भीतर एक बड़ा ज्वालामुखी सुलगा दिया है। क्या हेमंत सोरेन अपने विधायकों को एकजुट रखने में नाकाम रहे?कांग्रेस के अपने 16 विधायकों और मंत्रियों में से किसने पीठ में छुरा घोंपा?क्या यह सिर्फ एक राज्यसभा सीट की हार है या आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन के बिखरने का ट्रेलर है?
फिलहाल, इस चुनावी नतीजे ने यह साफ कर दिया है कि राजनीति में केवल कागजी संख्या बल होना काफी नहीं है, बल्कि उस संख्या बल को अंत तक अपने पाले में बनाए रखने की क्षमता असली मायने रखती है। और इस मामले में ‘कॉरपोरेट किंग’ परिमल नाथवानी का गणित, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की तथाकथित पारंपरिक राजनीति पर भारी पड़ गया।

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