उत्कल एसोसिएशन की 90 साल पुरानी दुर्गा पूजा, महाअष्टमी पर 2000 श्रद्धालुओं को मिलेगा कानिका भोग

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जमशेदपुर: लौहनगरी जमशेदपुर की पहचान यहां की बहुरंगी संस्कृति से भी है. शहर में अलग-अलग समाज के लोग अपनी-अपनी परंपराओं के साथ त्योहार मनाते हैं. साकची स्थित उत्कल एसोसिएशन की दुर्गा पूजा इसी सांस्कृतिक विविधता की मिसाल है. वर्ष 1934 से यहां मां दुर्गा की पूजा होती आ रही है. करीब नौ दशक पुरानी इस पूजा में आज भी भव्यता और दिखावे के बजाय परंपरा और आस्था को प्राथमिकता दी जाती है.उत्कल एसोसिएशन के अनुसार, पूजा के दौरान ओड़िया संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है. मां दुर्गा की पूजा विधि-विधान से संपन्न कराने के लिए ओडिशा के पुरी से विशेष पुजारियों को बुलाया जाता है. यहां मां दुर्गा की प्रतिमा भी पारंपरिक सांचे के अनुरूप तैयार की जाती है, जिसकी अपनी अलग पहचान है.

सादगी और परंपरा है पूजा की पहचान

उत्कल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. श्रीधर प्रधान ने बताया कि समय के साथ दुर्गा पूजा के आयोजन में काफी बदलाव आया है, लेकिन एसोसिएशन की पूजा में पुरानी परंपराओं को आज भी कायम रखा गया है. यहां पूजा में भव्य पंडाल या सजावट की प्रतिस्पर्धा के बजाय धार्मिक परंपराओं और आस्था को महत्व दिया जाता है. यही कारण है कि वर्षों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं.

महाअष्टमी पर विशेष कानिका भोग

उत्कल एसोसिएशन की दुर्गा पूजा में महाअष्टमी का विशेष महत्व है. इस दिन पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालुओं के बीच ओड़िया परंपरा के अनुसार विशेष कानिका भोग का वितरण किया जाता है. कानिका मीठे चावल से तैयार किया जाने वाला पारंपरिक ओड़िया व्यंजन है, जो विशेष अवसरों पर बनाया जाता है.कानिका भोग में कानिका के अलावा खीर, खट्टा, पीठा, साग, बैंगन भजा, दालमा समेत ओडिशा के कई पारंपरिक व्यंजन शामिल होते हैं. भोग को पारंपरिक स्वाद और विधि के अनुसार तैयार करने के लिए ओडिशा से विशेष कारीगर बुलाये जाते हैं.एसोसिएशन के महासचिव जजाती केसरी ने बताया कि पिछले वर्ष करीब 1500 श्रद्धालुओं के लिए भोग तैयार किया गया था. इस वर्ष श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए करीब 2000 लोगों के लिए कानिका भोग तैयार करने की व्यवस्था की गयी है.

21 अक्तूबर को होगा विसर्जन

उत्कल एसोसिएशन में इस वर्ष दुर्गा पूजा का आयोजन 17 अक्तूबर से शुरू हुआ है. विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के बाद 21 अक्तूबर को प्रतिमा विसर्जन के साथ पूजा का समापन होगा. करीब नौ दशक से चली आ रही यह पूजा जमशेदपुर में ओड़िया समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम बनी हुई है.

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