
जमशेदपुर: लौहनगरी के प्रतिष्ठित इंग्लिश मीडियम स्कूलों में नए सत्र के लिए ‘एडमिशन महापर्व’ का आगाज़ होते ही एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। शहर के कई नामी स्कूलों ने बीपीएल कोटे के तहत बच्चों का नामांकन लेने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। सरकार और स्कूल प्रबंधन के बीच छिड़ी इस खींचतान ने हजारों गरीब बच्चों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है।
विवाद की जड़: फंडिंग और जमीन का पेच
स्कूलों के इस कड़े रुख के पीछे सरकार का एक हालिया पत्र और भुगतान पर रोक है।स्कूल प्रबंधन का दावा है कि पहले सरकार बीपीएल बच्चों की शिक्षा पर होने वाले खर्च का पुनर्भुगतान करती थी, लेकिन अब सरकार ने इससे हाथ पीछे खींच लिए हैं।सरकार की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि चूंकि अधिकांश स्कूलों को जमीन टाटा स्टील ने फ्री में दी है और टाटा स्टील को सरकार ने जमीन लीज पर उपलब्ध कराई है, इसलिए सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना स्कूलों की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है।
एसोसिएशन का पलटवार: “नियमों के विरुद्ध है फैसला”
इंग्लिश मीडियम स्कूल एसोसिएशन ने सरकार के इस आदेश को अनुचित बताते हुए इसके विरोध का बिगुल फूंक दिया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष नकुल कमानी ने कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा पूरे देश में आरटीई के तहत कक्षा 6 से 12 तक के प्रावधानों पर चर्चा होती है, लेकिन झारखंड सरकार इसे नर्सरी से ही थोप रही है। जब सरकार बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहन नहीं कर रही, तो निजी स्कूलों पर यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना बिल्कुल भी न्यायसंगत नहीं है।”
न्यायालय की शरण में जाएंगे स्कूल
नकुल कमानी ने स्पष्ट किया कि इस गतिरोध को सुलझाने के लिए एसोसिएशन अब न्यायालय का दरवाजा खटाखटाएगी। उनका तर्क है कि जमीन के लीज का हवाला देकर शिक्षा के अधिकार अधिनियम के वित्तीय प्रावधानों को बदला नहीं जा सकता।
दांव पर गरीब बच्चों का भविष्य
इस विवाद का सबसे दुखद पहलू उन गरीब परिवारों के बच्चे हैं, जो बड़े स्कूलों में पढ़ने का सपना देख रहे थे।नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन स्कूलों के इनकार के बाद बीपीएल परिवारों के अभिभावक दर-दर भटकने को मजबूर हैं। जानकारों का मानना है कि यदि सरकार और स्कूलों के बीच यह कानूनी लड़ाई लंबी खिंचती है, तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के सैकड़ों बच्चे इस सत्र में शिक्षा के अधिकार से वंचित रह सकते हैं।
शिक्षा जगत में सुगबुगाहट
शहर के जागरूक नागरिकों और शिक्षाविदों का कहना है कि एक तरफ सरकार ‘समान शिक्षा’ का नारा दे रही है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी फंडिंग को लेकर हो रही यह खींचतान सरकार की मंशा पर सवाल उठाती है। अब सबकी नजरें अदालत के रुख पर टिकी हैं कि क्या गरीब बच्चों को स्कूलों की दहलीज के अंदर प्रवेश मिल पाएगा या नहीं।
