बोकारो । झारखंड की माटी में कला और संस्कृति की सुगंध रची-बसी है, जिसे यहाँ के समर्पित साधकों ने अपनी अटूट निष्ठा से जीवंत रखा है। बोकारो जिले के चंदनकियारी प्रखंड अंतर्गत खेड़ाबेड़ा गांव के रहने वाले प्रतिष्ठित छऊ नर्तक परीक्षित महतो ने अपनी कला के दम पर देश के सर्वोच्च शिखर तक का सफर तय किया। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक गरिमामयी समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के कर-कमलों द्वारा उन्हें देश के सबसे प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से नवाजा गया।वर्ष 1966 में एक साधारण कुड़मी कृषक परिवार में जन्मे परीक्षित महतो का यह सफर जितना गौरवशाली है, उतना ही आज का उनका जीवन संघर्षों और तंगहाली की मार झेल रहा है।
5 वर्ष की उम्र से शुरू हुआ सफर, 4 दशकों से लहरा रहे हैं छऊ का परचम
परीक्षित महतो के इस मुकाम तक पहुँचने की कहानी बेहद प्रेरणादायक है। बचपन से ही छऊ कला और फुटबॉल खेल के प्रति गहरा रुझान रखने वाले परीक्षित ने महज पांच वर्ष की उम्र से अपनी प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत की थी। वर्ष 1982 में मैट्रिक और उसके बाद चास कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने की ठान ली थी। वर्ष 1983 में महज 17-18 साल की उम्र में उन्होंने 30 से 40 स्थानीय युवाओं को एकजुट कर स्वयं एक छऊ पार्टी का गठन किया। उन्होंने छऊ नृत्य की बारीकियां इस विधा के महान उस्ताद स्वर्गीय धनंजय महतो और गंभीर सिंह मुण्डा जैसे दिग्गजों से सीखीं।कृषि कार्य के साथ-साथ इस पारंपरिक नृत्य को अपने जीवन का आधार बनाए रखने वाले परीक्षित महतो बीते चार दशकों से भी अधिक समय से निरंतर लोक कला का परचम लहरा रहे हैं।
मानभूम शैली में अतुलनीय योगदान, कालजयी भूमिकाओं से जीता दिल
छऊ नृत्य की मानभूम शैली के विकास और संरक्षण में उनका योगदान अद्भुत है। पौराणिक और ऐतिहासिक गाथाओं को जीवंत करने की उनकी कला का हर कोई कायल है। उन्होंने मंच पर कई कालजयी भूमिकाएं निभाई हैं जिसमे गणेश वन्दना में कार्तिक की भूमिका।महिषासुर वध में महिषासुर का जीवंत अभिनय। बिरसा मुण्डा, अभिमन्यु, महिरावण और किरात अर्जुन में किरात कृष्णा जैसी प्रमुख भूमिकाएं।अपने इसी हुनर के बल पर उन्होंने देश के कोने-कोने में इस लोक कला का प्रदर्शन किया। इसके लिए उन्हें 1991 में निरसा में ‘बेस्ट उस्ताद पुरस्कार’, 1995 में ‘दूरदर्शन पुरस्कार’, संस्कार भारती सम्मान और ‘चंदनकियारी महोत्सव सम्मान’ से भी नवाजा जा चुका है। उन्होंने अपने गांव में ‘घोषाल कृषि मंगल छऊ नृत्य समिति’ की स्थापना कर इस विधा को एक संगठित स्वरूप दिया।परीक्षित महतो आज के इस आधुनिक दौर में चंदनकियारी स्थित ‘राष्ट्रीय छऊ नृत्य प्रशिक्षण एवं अनुसंधान केंद्र’ में एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं। यह वही केंद्र है जिससे संबंधित सवाल कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन भी पूछ चुके हैं।
कर्ज लेकर बढ़ाया मान, पर झारखंड सरकार और प्रशासन मौन!
एक तरफ जहां परीक्षित महतो को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार के रूप में मिली सम्मान राशि, ताम्रपत्र और अंगवस्त्रम उनकी निस्वार्थ कला-साधना का प्रतिफल बने, वहीं दूसरी तरफ उनके खुद के जीवन में संघर्षों की पीड़ा असहनीय है।तंगहाली के बावजूद उन्होंने कर्ज़ लेकर चंदनकियारी का मान राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाने का काम किया है। झारखंड सरकार और बोकारो जिला प्रशासन की बेरुखी का आलम यह है कि: इतने बड़े राष्ट्रीय स्तर के कलाकार के पास अपने वाद्ययंत्र और बेशकीमती छऊ मुखौटों को सुरक्षित रखने के लिए एक अदद भवन तक नहीं है। दिल्ली के राजपथ पर अपनी छऊ नृत्य कला का शानदार प्रदर्शन करने के बावजूद, उन्हें अब तक उनकी कला का मेहनताना (मानदेय राशि) भुगतान नहीं किया गया है।
क्या बदलेगी तस्वीर या रहेगी ‘वही ढाक के तीन पात’?
अब देखना भविष्य के गर्भ में है कि ऐसे महान कलाकार और लुप्त होती लोक कला के संरक्षण के लिए झारखंड सरकार, बोकारो जिला प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधि आगे आते हैं या फिर वही ‘ढाक के तीन पात’ वाली कहावत चरितार्थ होगी। जरूरत है कि ऐसे कलाकारों को समय रहते आर्थिक और ढांचागत संबल प्रदान किया जाए ताकि झारखंड का मान देश-दुनिया में हमेशा बढ़ता रहे।
