सोन नद जल बंटवारा समझौते पर सरयू राय का सवाल, कहा- झारखंड को एक लोटा पानी भी अतिरिक्त नहीं मिला

जमशेदपुर। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने बिहार और झारखंड के बीच 31 अगस्त को हुए सोन नद जल बंटवारा समझौते पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि इस समझौते से झारखंड को एक लोटा पानी भी अतिरिक्त नहीं मिला है। उनके अनुसार झारखंड के हिस्से का 20 लाख एकड़ फीट पानी वर्ष 1973 के बाणसागर समझौते में ही निर्धारित हो चुका था।

सरयू राय बोले- नया जल आवंटन नहीं है 31 अगस्त का समझौता

सरयू राय ने कहा कि बाणसागर समझौते में अविभाजित बिहार को इंद्रपुरी बराज पर कुल 7.75 एमएएफ पानी मिला था। इसमें करीब 5 एमएएफ पानी पुराने सोन नहर क्षेत्र के लिए आरक्षित था। शेष 2.75 एमएएफ यानी 27.50 लाख एकड़ फीट पानी में बिहार और झारखंड का हिस्सा तय होना था।इसी हिस्से में से झारखंड के लिए 20 लाख एकड़ फीट पानी निर्धारित किया गया था। ऐसे में सरयू राय ने सवाल उठाया कि 31 अगस्त के समझौते में नया पानी आया कहां से?

कनहर और उत्तर कोयल नदियों के पानी का दिया हवाला

विधायक ने कहा कि यह पानी मुख्य रूप से झारखंड की कनहर और उत्तर कोयल नदियों, उनकी सहायक नदियों तथा उन क्षेत्रों का है, जिनका पानी सीधे सोन नदी में पहुंचता है।उन्होंने बताया कि इसमें कनहर का करीब 4.32 लाख एकड़ फीट और उत्तर कोयल का करीब 15.627 लाख एकड़ फीट पानी शामिल है।

कनहर में पानी के इस्तेमाल की योजना भी अधूरी

सरयू राय के अनुसार बाणसागर समझौते के समय कनहर नदी में कुल जल उपलब्धता करीब 24 लाख एकड़ फीट आंकी गई थी। इसमें से लगभग 4.30 लाख एकड़ फीट पानी झारखंड के हिस्से में आया था।इस पानी के उपयोग के लिए छत्तीसगढ़-झारखंड सीमा पर बाराडीह में डैम बनाने की योजना बनाई गई थी, लेकिन योजना अब तक पूरी नहीं हो सकी।

उत्तर कोयल नदी के पानी का भी उठाया मुद्दा

सरयू राय ने कहा कि उत्तर कोयल नदी में करीब 21 लाख एकड़ फीट पानी की उपलब्धता आंकी गई थी। इसमें से 15.627 लाख एकड़ फीट पानी का उपयोग वर्तमान में मोहम्मदगंज बराज से पलामू के हुसैनाबाद, हरिहरगंज और बिहार के नवीनगर की नहरों के माध्यम से हो रहा है।शेष करीब 5.373 लाख एकड़ फीट पानी सीधे इंद्रपुरी बराज की ओर बह रहा है। उन्होंने कहा कि मंडल डैम बनने के बाद इस पानी का उपयोग बिहार और झारखंड की सहमति से किया जा सकता है।

कदवन डैम का भी उठाया मुद्दा

सरयू राय ने कदवन डैम का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि बाणसागर समझौते के बाद झारखंड के कदवन गांव के समीप डैम बनाने की योजना बनी थी। इसका शिलान्यास बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने वर्ष 1980 में किया था, लेकिन परियोजना अब तक पूरी नहीं हो सकी।उन्होंने कहा कि 31 अगस्त के समझौते में संभवतः कदवन डैम बनाने का प्रावधान किया गया है, लेकिन इससे झारखंड को क्या लाभ मिलेगा और इसके बदले बिहार को झारखंड से क्या मिलेगा, यह स्पष्ट नहीं है।

जल विद्युत के बंटवारे पर भी सवाल

सरयू राय ने समझौते में बनने वाली जल विद्युत के बंटवारे को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि इस संबंध में समझौते में स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए थी।उनके अनुसार झारखंड को आवंटित 20 लाख एकड़ फीट पानी के इस्तेमाल के लिए कनहर और उत्तर कोयल बेसिन में जरूरी योजनाएं नहीं बन सकीं। मंडल डैम और ओरंगा की प्रस्तावित योजनाएं भी आगे नहीं बढ़ पाईं।

‘नई बोतल में पुरानी शराब’ बताया समझौता

सरयू राय ने 31 अगस्त के समझौते को ‘नई बोतल में पुरानी शराब’ करार दिया। उन्होंने कहा कि बिहार और झारखंड सरकारों को लंबित जल संसाधन परियोजनाओं को पूरा कराने के लिए केंद्र सरकार से आवश्यक सहयोग मांगना चाहिए था।उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार को केंद्र से सहायता पैकेज की मांग करनी चाहिए, क्योंकि इन योजनाओं के लंबित रहने में केंद्र और केंद्रीय जल आयोग की भी भूमिका रही है।

‘बिहार और झारखंड दोनों ठगे गए’

सरयू राय ने कहा कि वास्तव में वर्ष 1973 के बाणसागर समझौते के क्रियान्वयन में बिहार और झारखंड दोनों के साथ नाइंसाफी हुई है। उनके मुताबिक केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी में हुए 31 अगस्त के समझौते में लंबित परियोजनाओं और पानी के उपयोग से जुड़े मुद्दों पर ज्यादा स्पष्ट चर्चा होनी चाहिए थी।उन्होंने कहा कि जल आवंटन की समस्या पहले ही सुलझाई जा चुकी है। अब मुख्य जरूरत उत्तर कोयल नदी बेसिन की लंबित योजनाओं को पूरा करने की है।

बिहार और झारखंड सरकारों को दी बधाई

हालांकि सरयू राय ने कहा कि बिहार और झारखंड के बीच पुराने मामले को नए सिरे से समझौते के जरिए सुलझाने की पहल के लिए दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बधाई और धन्यवाद दिया जाना चाहिए।

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