
जमशेदपुर: हाथियों के झुंड और घने जंगलों के लिए विख्यात दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी अब अपनी जैव विविधता का एक नया और अद्भुत अध्याय लिख रहा है। दलमा के जंगलों में दुर्लभ मांसाहारी पौधों की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। वन विभाग और शोधकर्ताओं के लिए यह खोज दलमा के पारिस्थितिकी तंत्र की समृद्धि का एक बड़ा प्रमाण मानी जा रही है।
ड्रोसेरा और यूटिकुलेरिया की पहचान
ड्रोसेरा बर्मानी : पटमदा क्षेत्र में पाए जाने वाले इस पौधे को ‘सनड्यू’ भी कहा जाता है। यह कीटों को अपनी चिपचिपी बूंदों में फंसाकर उनका भक्षण करता है।
यूटिकुलेरिया: बालीगुमा और कोंकादाशा के जलीय व नमी वाले क्षेत्रों में इस प्रजाति की पहचान हुई है। यह सूक्ष्म जीवों और कीटों को एक ‘ब्लेडर’ जैसी संरचना में कैद कर अपना पोषण प्राप्त करता है।
क्यों खास हैं ये पौधे?
फॉरेस्ट गार्ड और शोधार्थी राजा घोष के अनुसार, ये पौधे उन जगहों पर उगते हैं जहाँ मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी होती है। अपनी इस कमी को पूरा करने के लिए ये पौधे कीटों और सूक्ष्म जीवों का शिकार करते हैं। दलमा में इनकी मौजूदगी यह दर्शाती है कि यहाँ का प्राकृतिक आवास बहुत पुराना और संरक्षित है।
संरक्षण के लिए उठेंगे कड़े कदम
वन विभाग ने इस खोज को गंभीरता से लिया है। राजा घोष ने इस संबंध में वरीय अधिकारियों को विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी है। जिन विशिष्ट क्षेत्रों में ये पौधे पाए गए हैं, वहां इंसानी दखलंदाजी को कम करने और नियंत्रित करने की योजना है।ये पौधे कीटों की आबादी को नियंत्रित कर प्रकृति में संतुलन बनाए रखते हैं। वन विभाग अब इनके संरक्षण के लिए एक विशेष कार्ययोजना तैयार कर रहा है।
दलमा की बढ़ती महत्ता
वरीय वन अधिकारियों का मानना है कि इन दुर्लभ पौधों की खोज के बाद दलमा अब केवल वन्यजीव प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि वनस्पति विज्ञान के शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए भी आकर्षण का बड़ा केंद्र बनेगा। यह खोज प्रमाणित करती है कि बेहतर संरक्षण के कारण दलमा का इको-सिस्टम लगातार फल-फूल रहा है।
