
जमशेदपुर: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समावेशिता और समानता से जुड़े नए दिशा-निर्देशों को लेकर विवाद छिड़ गया है। संयुक्त युवा संघ ने केंद्र सरकार और यूजीसी की प्रस्तावित नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए इसे ‘एकतरफा’ करार दिया है। संगठन का दावा है कि प्रस्तावित शिकायत निवारण समितियां सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल की जा सकती हैं।
“फास्ट ट्रैक” प्रक्रिया पर उठाए सवाल
प्रधानमंत्री को संबोधित ज्ञापन में संघ ने आरोप लगाया कि यूजीसी की नई गाइडलाइंस में शिकायतों के निपटारे के लिए जिस ‘त्वरित कार्रवाई’ की बात कही गई है, उसमें पारदर्शिता का अभाव है। संघ के अनुसार शिकायतों की प्रारंभिक सत्यता जांचने के लिए कोई ठोस मानक तय नहीं किए गए हैं। स्पष्ट मानकों के बिना निर्दोष छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ केवल शिकायत के आधार पर एकतरफा कार्रवाई होने का डर बना रहेगा।
प्राकृतिक न्याय और मेधा पर असर
संयुक्त युवा संघ ने ज्ञापन में कहा कि वर्तमान प्रारूप में ये नियम ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ का उल्लंघन करते हैं। संगठन का मानना है कि इस व्यवस्था से शैक्षणिक संस्थानों में निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकते हैं। शिक्षकों और छात्रों के बीच संवाद में डर का माहौल बनेगा, जिससे अभिव्यक्ति की आजादी प्रभावित होगी।केवल श्रेणी आधारित संरक्षण से शिक्षा की गुणवत्ता और योग्यता प्रभावित होने की आशंका है।
संघ की प्रमुख मांगें
संयुक्त युवा संघ ने सरकार के समक्ष सुधार के लिए निम्नलिखित मांगें रखी हैं जिसमे शिकायत निवारण समितियों का गठन निष्पक्ष हो और उसमें सभी वर्गों का उचित प्रतिनिधित्व हो, दुर्भावनापूर्ण या झूठी शिकायत दर्ज कराने वालों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान किया जाए,किसी भी कार्रवाई से पहले अनिवार्य रूप से दो स्तरों पर निष्पक्ष जांच की जाए और सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को भी झूठे आरोपों से बचने के लिए समान कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाए।
संगठन का संकल्प
संघ के प्रतिनिधियों ने कहा कि वे समावेशिता के विरोधी नहीं हैं, लेकिन नियमों के नाम पर किसी एक वर्ग का उत्पीड़न स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने मांग की है कि यूजीसी इन दिशा-निर्देशों पर पुनर्विचार करे और सभी हितधारकों से चर्चा के बाद ही इसे अंतिम रूप दिया जाए।
