जमशेदपुर में खुलेआम मांस बिक्री पर उठे सवाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन की उठी मांग

जमशेदपुर: झारखंड के जमशेदपुर में खुलेआम मांस और मछली की बिक्री को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कुछ सामाजिक संगठनों और अधिवक्ताओं ने दावा किया है कि खाद्य सुरक्षा मानकों और न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप खुले में मांस के प्रदर्शन और बिक्री पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही है। इस संबंध में जिला प्रशासन से नियमों का पालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है।

मानवाधिकार सम्मेलन ने बनाई नियमावली लागू करने की मांग

झारखंड मानवाधिकार सम्मेलन के चेयरमैन मनोज मिश्रा ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत प्रत्येक नागरिक को वैध व्यवसाय करने का अधिकार प्राप्त है। उन्होंने मांग की कि अस्पतालों, विद्यालयों, धार्मिक स्थलों और भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों के आसपास स्वच्छता एवं जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट नियमावली लागू की जाए। साथ ही सभी मांस, चिकन और मछली विक्रेताओं के लिए लाइसेंस और खाद्य सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।

अधिवक्ता ने स्वच्छता और सुरक्षा को लेकर जताई चिंता

अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने आरोप लगाया कि खुले में मांस बिक्री और अपशिष्ट फेंके जाने से स्वच्छता प्रभावित हो रही है। उनका कहना है कि खुले में फेंके गए मांस के अवशेषों के कारण आवारा पशु आक्रामक हो रहे हैं, जिससे आम लोगों, खासकर बच्चों की सुरक्षा पर भी असर पड़ रहा है। उन्होंने जिला प्रशासन से इस मामले में तत्काल कार्रवाई की मांग की।

उपायुक्त बोले- जानकारी लेकर कराएंगे नियमों का पालन

पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त राजीव रंजन ने कहा की सुप्रीम कोर्ट के आदेश के वे सम्मान करते है लेकिन उन्हें किसी भी प्रकार का इससे सम्बंधित निर्देशित पत्र या आदेश प्राप्त नहीं हुआ है बावजूद वे अपने स्तर से जानकारी प्राप्त कर जल्द ही जमशेदपुर मे भी इस नियम का पालन कराएँगे।

खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता पर प्रशासनिक कार्रवाई की उम्मीद

इस मुद्दे को लेकर अब प्रशासन की अगली कार्रवाई पर सभी की नजर है। यदि संबंधित दिशा-निर्देश लागू होते हैं, तो शहर में मांस और मछली की बिक्री से जुड़े लाइसेंस, स्वच्छता मानकों और सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर अभियान चलाया जा सकता है।

नोट: संबंधित पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया है। ऐसे मामलों में लागू नियमों और उनके दायरे का निर्धारण सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार किया जाता है।

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